कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया

kuch dino to shahar sara

कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया फिर हुआ यूँ वो किसी की मैं किसी का

उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ

uth ke kapde badal ghar se

उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ रात के बाद दिन आज के

ज़ीस्त उनवान तेरे होने का

zist unwan tere hone ka

ज़ीस्त उनवान तेरे होने का दिल को ईमान तेरे होने का, मुझ को हर सम्त ले के जाता

हम ने जिस के लिए फूलों के जहाँ छोड़े हैं

hum ne jis ke liye

हम ने जिस के लिए फूलों के जहाँ छोड़े हैं उस ने इस दिल में फ़क़त ज़ख़्म ए

ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी

zard mausam ke ek sazar jaisi

ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी सारी बस्ती है मेरे घर जैसी, जब बिगड़ता है वक़्त इंसाँ का

ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में

khatm hai baadal ki jab se

ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में आग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में, चाँद

एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ

ek haveli hoon us

एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ, अपनी मस्ती

कुछ ज़रूरत से कम किया गया है

kuch zarurat se kam

कुछ ज़रूरत से कम किया गया है तेरे जाने का ग़म किया गया है, ता क़यामत हरे भरे

ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए

zauq e gunah o

ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए क्या क्या हुनर हैं हज़रत ए इंसाँ लिए हुए,

जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है

judaai rooh ko jab

जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है ख़ुनुक हवा भी बदन को उबाल देती है, अगर हो वक़्त