ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में
ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में आग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में, चाँद
Life Poetry
ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में आग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में, चाँद
नई पोशाक पहने है पुराने ख़्वाब की हसरत मैं हँस कर टाल देती हूँ दिल ए बेताब की
चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखें दिल पे आँखें रखे तेरी साँसें देखें, सुर्ख़ लबों से सब्ज़
एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ, अपनी मस्ती
कुछ ज़रूरत से कम किया गया है तेरे जाने का ग़म किया गया है, ता क़यामत हरे भरे
भुला दिया था जिस को एक शाम याद आ गया ग़ज़ाल देख कर वो ख़ुश ख़िराम याद आ
ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए क्या क्या हुनर हैं हज़रत ए इंसाँ लिए हुए,
जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है ख़ुनुक हवा भी बदन को उबाल देती है, अगर हो वक़्त
दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत घर को वीराँ करूँ तो घास बहुत, रोब पड़ जाए इस
अब रहा क्या जो लुटाना रह गया ज़िंदगी का एक ताना रह गया, एक तअल्लुक़ जिन से था