ज़िंदगी भी अजब तमाशा है
ज़िंदगी भी अजब तमाशा है कभी आशा कभी निराशा है, जिस में करती हैं गुफ़्तुगू आँखें वो मोहब्बत
Life Poetry
ज़िंदगी भी अजब तमाशा है कभी आशा कभी निराशा है, जिस में करती हैं गुफ़्तुगू आँखें वो मोहब्बत
ज़िक्र होता है उस परी वश का जब भी महफ़िल में बात होती है, उस की यादों की
अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो इतना गहरा मेरी आवाज़ से पर्दा न करो,
ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दीया हूँ और हवा
बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक
कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली न पूछ कैसे बसर हम ने ज़िंदगी कर ली,
मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना जहाँ दरिया मिले बे आब मेरा नाम लिख देना, ये
तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दिया वहीं महव ए हैरत ए बे
मोहब्बत ही न जो समझे वो ज़ालिम प्यार क्या जाने निकलती दिल के तारों से जो है झंकार
ला पिला दे साक़िया पैमाना पैमाने के बा’द बात मतलब की करूँगा होश आ जाने के बा’द, जो