जो वफ़ा का रिवाज रखते हैं…

jo wafa ka riwaz rakhte hai

जो वफ़ा का रिवाज रखते हैं साफ़ सुथरा समाज रखते हैं, क़ाबिल ए रहम हैं वो इंसाँ जो

ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए

khwab ka rishta haqiqat

ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए, अब भी

दुनियाँ में शातिर नहीं अब शरीफ़…

duniyan me shatir nahi

दुनियाँ में शातिर नहीं अब शरीफ़ लटकते है अब सच्चो की बात छोड़ो वो तो सर पटकते है,

रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है…

rang e nafrat tere

रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है कभी ? एक रवैया है मुरव्वत, उसे बरता है कभी

यहाँ मरने की दुआएँ क्यूँ मांगूँ ?

yahan marne ki duaayen

यहाँ मरने की दुआएँ क्यूँ मांगूँ ? यहाँ जीने की तमन्ना कौन करे ? ये दुनियाँ हो या

मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ

main jab bhi koi achhuta

मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ तो पहले एक गज़ल तेरे नाम लिखता हूँ, बदन की

काम उसके सारे ही सय्याद वाले है…

kaam uske saare hi

काम उसके सारे ही सय्याद वाले है मगर मैं उसे बहेलिया नहीं लिखता सर्दियाँ जितनी हो सब सह

हमसे तो किसी काम की बुनियाद न होवे

hamse to kisi kaam ki

हम से तो किसी काम की बुनियाद न होवे जब तक कि उधर ही से कुछ इमदाद न

हम न निकहत हैं न गुल हैं जो महकते…

ham nikhat hai na gul

हम न निकहत हैं न गुल हैं जो महकते जावें आग की तरह जिधर जावें दहकते जावें, ऐ

अपने घर की चारदीवारी में अब…

apne ghar ki chaardeewari

अपने घर की चारदीवारी में अब लिहाफ़ में भी सिहरन होती है जिस दिन से किसी को गुर्बत