एक रात लगती है एक सहर बनाने में…
एक रात लगती है एक सहर बनाने में हमने क्यों नहीं सोचा हमसफ़र बनाने में ? मंज़िलें बदलते
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एक रात लगती है एक सहर बनाने में हमने क्यों नहीं सोचा हमसफ़र बनाने में ? मंज़िलें बदलते
दिन रात उसके हिज्र का दीमक लगे लगे दिल के तमाम ख़ाने मुझे खोखले लगे, महफ़िल में नाम
छोड़ कर ऐसे गया है छोड़ने वाला मुझे दोस्तो उसने कहीं का भी नहीं छोड़ा मुझे, बोलबाला इस
अब दरमियाँ कोई भी शिकायत नहीं बची या’नी क़रीब आने की सूरत नहीं बची, अब और कोई सदमा
अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं क़ज़ा ही इसकी सज़ा है तो कोई बात नहीं,
पथरा गई आँखे तेरा इंतज़ार करते करते टूट गए हम एक तरफ़ा प्यार करते करते, क़यामत है इज़हार
टूट कर बिखरे हुए इन्सान कहाँ जाएँगे ? दूर तक सन्नाटा है नादान कहाँ जाएँगे ? रिश्ते जो
किसे ख़बर थी हवा राह साफ़ करते हुए मेरा तवाफ़ करेगी तवाफ़ करते हुए, मैं ऐसा हँस रहा
रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना कोई सूखा पेड़ मिले तो उस से
फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे और इस दिल की तरफ़ बरसे तो पत्थर बरसे, कोई बादल