भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ

भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ
बनाई राह पे चलता नहीं हूँ,

मुझे रंगने की कोशिश मत करो तुम
मैं माज़ी का कोई पन्ना नहीं हूँ,

मुझे ही लोग खो देते हैं अक्सर
किसी को मैं कभी खोता नहीं हूँ,

मैं शामिल हूँ फ़क़ीरों की ख़ुशी में
मैं सिक्का हूँ मगर खोटा नहीं हूँ,

नहा लेता हूँ जा कर मयकदे में
लहू से हाथ मैं धोता नहीं हूँ,

ग़ज़ल के गाँव में सब हैं मुनाफ़िक़
किसी के घर मैं अब जाता नहीं हूँ,

बिछा कर जिस्म की चादर वो बोला
समझते हो जो तुम वैसा नहीं हूँ,

मेरी क़ीमत गिरा सकते नहीं तुम
मैं इंसाँ हूँ कोई रुपया नहीं हूँ..!!

~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स

वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना

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