अज़ीब ख़्वाब था उसके बदन पे काई थी

azib khwab tha uske badan

अज़ीब ख़्वाब था उसके बदन पे काई थी वो एक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी, वो

ख़ुद हो गाफ़िल तो अक्सर ये भी भूल जाते है

khud ho gafil to aksar

ख़ुद हो गाफ़िल तो अक्सर ये भी भूल जाते है कि ख़ुदा सब देख रहा है वो अंजान

बड़े बड़े शहरों की अब यही पहचान है

bade bade shaharo ki

बड़े बड़े शहरों की अब यही पहचान है ऊँची इमारतें और छोटे छोटे इन्सान है, अहल ए शहर

काली रात के सहराओं में नूर सिपारा लिखा था

kaali raat ke sahraao me

काली रात के सहराओं में नूर सिपारा लिखा था जिस ने शहर की दीवारों पर पहला ना’रा लिखा

शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो

shabnam hai ki dhokha hai

शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो दिल दश्त में एक प्यास तमाशा है

जिस से मिल बैठे लगी वो शक्ल पहचानी हुई

जिस से मिल बैठे

जिस से मिल बैठे लगी वो शक्ल पहचानी हुई आज तक हमसे यही बस एक नादानी हुई, सैकड़ों

मैंने दुनियाँ से, मुझसे दुनियाँ ने

मैंने दुनियाँ से मुझसे

मैंने दुनियाँ से, मुझसे दुनियाँ ने सैकड़ो बार बेवफ़ाई की, आसमां चूमता है मेरे क़दम दाद दीजिए शिकश्तापाई

दिल चाहे कि आज कुछ सुनहरा लिखूँ

दिल चाहे कि आज

दिल चाहे कि आज कुछ सुनहरा लिखूँ मैं ज़ात पे मेरी एक पैरा लिखूँ, मैं लिखूँ हयात सारी

उधर की शय इधर कर दी गई है

उधर की शय इधर

उधर की शय इधर कर दी गई है ज़मीं ज़ेर ओ ज़बर कर दी गई है, ये काली

तुम साथ चले थे तो मेरे साथ चला दिन

tum saath chale the to

तुम साथ चले थे तो मेरे साथ चला दिन तुम राह से बिछड़े थे कि बस डूब गया