ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो
अपना पराया मेहरबाँ ना मेहरबाँ कोई न हो,
जा कर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं
दुनिया मुझे ढूँडे मगर मेरा निशाँ कोई न हो,
उल्फ़त का बदला मिल गया वो ग़म लुटा वो दिल गया
चलना है सब से दूर दूर अब कारवाँ कोई न हो..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा
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