दिल ए बेताब की मुझको हिमायत अब नहीं करनी
मुझे आज़ाद रहना हैं मुहब्बत अब नहीं करनी,
गिला शिकवा जो करता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं
मुझे ख़ामोश रहना है, शिकायत अब नहीं करनी,
ज़रा सी चोट लगती है ये दिल फिर टूट जाता है
शिकस्ता दिल को रहने दो मरम्मत अब नहीं करनी,
शराफ़त ओढ़ रखी थी बहुत कुछ सह लिया अब तक
बुरे बन जाएँगे हम भी रियायत अब नहीं करनी,
नहीं कुछ भी हुआ हासिल लुटा कर प्यार की दौलत
कभी बे फैज़ लोगों से रफ़ाक़त अब नहीं करनी..!!
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