मैंने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है
और तू है कि मेरी जान को आया हुआ है,
बस इसी बोझ से दोहरी हुई जाती है कमर
ज़िंदगी का जो ये एहसान उठाया हुआ है,
क्या हुआ गर नहीं बादल ये बरसने वाला
ये भी कुछ कम तो नहीं है जो ये आया हुआ है,
राह चलती हुई इस राहगुज़र पर अजमल
हम समझते हैं क़दम हमने जमाया हुआ है,
हम ये समझे थे कि हम भूल गए हैं उसको
आज बे तरह हमें याद जो आया हुआ है,
वो किसी रोज़ हवाओं की तरह आएगा
राह में जिस की दिया हमने जलाया हुआ है,
कौन बतलाए उसे अपना यक़ीं है कि नहीं
वो जिसे हमने ख़ुदा अपना बनाया हुआ है,
यूँ ही दीवाना बना फिरता है वर्ना अजमल
दिल में बैठा हुआ है ज़ेहन पे छाया हुआ है..!!
~अजमल सिराज
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