हमें कुछ पता नहीं है हम क्यूँ बहक रहे हैं ?
रातें सुलग रही हैं दिन भी दहक रहे हैं,
जब से है तुमको देखा हम इतना जानते हैं
तुम भी महक रहे हो हम भी महक रहे हैं,
बरसात भी नहीं पर बादल गरज रहे हैं
सुलझी हुई हैं ज़ुल्फ़ें और हम उलझ रहे हैं,
मदमस्त एक भंवरा क्या चाहता कली से
तुम भी समझ रहे हो हम भी समझ रहे हैं,
अब भी हसीन सपने आंखों में पल रहे हैं
पलकें हैं बंद फिर भी आँसू निकल रहे हैं,
नींदें कहाँ से आए इस दर पे करवटें हैं
वहाँ तुम बदल रहे हो यहाँ हम बदल रहे हैं..!!
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