यूँ तेरे हुस्न की तस्वीर ग़ज़ल में आए
जैसे बिल्क़ीस सुलेमाँ के महल में आए,
जब्र से एक हुआ ज़ाएक़ा ए हिज्र ओ विसाल
अब कहाँ से वो मज़ा सब्र के फल में आए ?
ये भी आराइश ए हस्ती का तक़ाज़ा था कि हम
हल्क़ा ए फ़िक्र से मैदान ए अमल में आए,
हर क़दम दस्त ओ गरेबाँ है यहाँ ख़ैर से शर
हम भी किस मारका ए जंग ओ जदल में आए,
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर से जिला पाती थी
हाए क्या लोग थे जो दाम ए अजल में आए..!!
~नासिर काज़मी
तेरे मिलने को बेकल हो गए हैं
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं





























