वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए रह का गुमाँ है
वो शो’ला ए आवारा हमारी ही ज़बाँ है,
अब हाथ हमारे है इनाँ रख़्श ए जुनूँ की
अब सर पे हमारे कुलह ए संग ए बुताँ है,
बस फेर के मुँह ख़ार क़दम खींच रहे थे
देखा तो निहाँ क़ाफ़िला ए हम सफ़राँ है,
चुभते ही बनी ख़ार सिफ़त पा ए ख़िज़ाँ में
क्या कीजे बहुत हम को ग़म ए लाला रुख़ाँ है,
काम आए बहुत लोग सर ए मक़्तल ए ज़ुल्मात
ऐ रौशनी ए कूचा ए दिल दार कहाँ है,
ऐ फ़स्ल ए जुनूँ हम को पए शग़्ल ए गरेबाँ
पैवंद ही काफ़ी है अगर जामा गिराँ है,
मजरूह कहाँ से गुहर ए गंदुम ओ जौ लाएँ
अपनी तो गिरह में यही चश्म ए निगराँ है..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
आबला पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में
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