अदा ए तूल ए सुख़न क्या वो इख़्तियार करे
जो अर्ज़ ए हाल ब तर्ज़ ए निगाह ए यार करे,
बहुत ही तल्ख़ नवा हूँ मगर अज़ीज़ ए वतन
मैं क्या करूँ जो तेरा दर्द बे क़रार करे,
क़दम को फ़ैज़ ए जुनूँ से वो हौसला है नसीब
जो ख़ार ए राह को भी शम ए रहगुज़ार करे,
जगाएँ हम सफ़रों को उठाएँ परचम ए शौक़
न जाने कब हो सहर कौन इंतिज़ार करे ?
मिसाल मिलती है कितनों की उस दिवाने से
चमन से दूर जो बैठा ग़म ए बहार करे,
दयार ए जौर में रस्ता है एक यही वर्ना
किसे पसंद है ऐ दिल कि सैर दार करे,
ख़ुदा करे ग़म ए गीती का पेच ओ ताब ऐ दोस्त
कुछ और भी तेरी ज़ुल्फ़ों को ताबदार करे,
सितम कि तेग़ ए क़लम दें उसे जो ऐ मजरूह
ग़ज़ल को क़त्ल करे नग़्मे को शिकार करे..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
वो तो गया ये दीदा ए ख़ूँ बार देखिए
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