सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में
उलझनें कितनी हैं इस इश्क़ की आसानी में,
ये तेरे बालों का तालाब की तह को छूना
हालत ए ख़्वाब में या आलम ए उर्यानी में,
बे हिजाबाना किसी लहर का तुझ तक आना
फिर तिरे जिस्म का बह जाना घने पानी में,
कहकशाओं का ग़ज़ालों का ग़ज़ल ज़ादों का
दूर ओ नज़दीक से आना तेरी मेहमानी में,
रात का झुकना तेरी पुश्त पे दिलदारी को
बाग़ के पेड़ों का आ जाना रजज़ ख़्वानी में,
बाम ओ दर देखते जाते हैं खड़े सकते में
एक सितारे का तवारुद तेरी पेशानी में,
मरमरीं उँगलियाँ एक दिल पे लिखें हाल ए हिना
फूल आवाज़ का खिल जाए पशेमानी में,
चाँद मख़रूती उभारों पे शुआएँ फेंके
इस क़दर महव तुझे देख के हैरानी में,
साया ए साबित ओ सय्यार के हाले में चलूँ
और जहानों में रहूँ तेरी निगहबानी में..!!
~आमिर सुहैल
ये तेरे हुस्न का आवेज़ा जो महताब नहीं
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