शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई
उसे तो आना था हर हाल में चली आई,
कहीं ख़ुदा न बने मुझ से ख़ौफ़ ए हिज्र ए अज़ीज़
कभी रुलाई कभी सोच के हँसी आई,
उछल रही थीं बहुत मछलियाँ सी आँखों में
जो डाला जाल तो खिंचती हुई नदी आई,
हवा के हाथ जले एक दिया जलाने में
वो सारी बस्ती जलाती हुई चली आई,
वो अपने साथ कई साए ले के डूबेगा
यही उमीद दर ए शम्स से लगी आई..!!
~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स
जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव
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