सूरज उस के घर की कोई खिड़की है

सूरज उस के घर की कोई खिड़की है
सुब्ह खुले तो शाम को बँद हो जाती है,

नस्ल ए आदम जिस के पीछे है पागल
दुनिया जन्नत से भागी एक लड़की है,

इश्क़ भी फ़र्ज़ है तेरे इंसाँ होने का
शादी भी सामाजिक ज़िम्मेदारी है,

नीला दुपट्टा याद है क्या तुम को उस का
आसमान के सीने पर जो भारी है,

दिल से आँखों तक एक नद्दी है जिस में
हर दम उल्टी गंगा बहती रहती है,

दुनिया है एहसास का एक बेकल दरिया
इश्क़ तो पार उतरने की तय्यारी है,

आग लगी है दिल में फिर भी ग़म है मकीन
जैसे तितली अंगारे पर बैठी है,

काँटे तो चुभते हैं केवल पाँव में
फूलों की दिल के छालों से यारी है,

राम नहीं हूँ मैं न तो वो ही है सीता
पागल लड़की सारी बात समझती है,

शम्स हवा में रहने से तो लाख गुना
बेहतर है वो शख़्स कि जिस पर मिट्टी है..!!

~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

1 thought on “सूरज उस के घर की कोई खिड़की है”

Leave a Reply