मसर्रतों को ये अहल ए हवस न खो देते
जो हर ख़ुशी में तेरे ग़म को भी समो देते,
कहाँ वो शब कि तेरे गेसुओं के साए में
ख़याल ए सुब्ह से हम आस्तीं भिगो देते,
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते,
बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मेरा डुबो देते,
जो देखते मेरी नज़रों पे बंदिशों के सितम
तो ये नज़ारे मेरी बेबसी पे रो देते,
कभी तो यूँ भी उमँडते सरिश्क ए ग़म मजरूह
कि मेरे ज़ख़्म ए तमन्ना के दाग़ धो देते..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं
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