तुम आ गए हो तो क्यूँ इंतिज़ार ए शाम करें
कहो तो क्यूँ न अभी से कुछ एहतिमाम करें,
ख़ुलूस ओ मेहर ओ वफ़ा लोग कर चुके हैं बहुत
मेरे ख़याल में अब और कोई काम करें,
ये ख़ास ओ आम की बेकार गुफ़्तुगू कब तक
क़ुबूल कीजिए जो फ़ैसला अवाम करें,
हर आदमी नहीं शाइस्ता ए रुमूज़ ए सुख़न
वो कम सुख़न हो मुख़ातब तो हम कलाम करें,
जुदा हुए हैं बहुत लोग एक तुम भी सही
अब इतनी बात पे क्या ज़िंदगी हराम करें,
ख़ुदा अगर कभी कुछ इख़्तियार दे हम को
तू पहले ख़ाक नशीनों का इंतिज़ाम करें,
रह ए तलब में जो गुमनाम मर गए नासिर
मता ए दर्द उन्ही साथियों के नाम करें..!!
~नासिर काज़मी
शहर सुनसान है किधर जाएँ
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