जान जब तक फ़िदा नहीं होती
पूरी रस्म ए वफ़ा नहीं होती,
शीशा टूटे तो होती है आवाज़
दिल जो टूटे सदा नहीं होती,
बंदा परवर हिजाब लाज़िम है
हर नज़र पारसा नहीं होती,
बेवफ़ा से न रख वफ़ा की आस
बेवफ़ा से वफ़ा नहीं होती,
जब से उस बुत पे आ गया है दिल
हम से याद ए ख़ुदा नहीं होती,
आशिक़ी की नमाज़ ऐ ज़ाहिद
आशिक़ों से क़ज़ा नहीं होती,
आप नज़दीक जब नहीं होते
दूर ग़म की बला नहीं होती,
हो न जब तक ख़ुलूस दिल के साथ
इल्तिजा इल्तिजा नहीं होती,
कुछ भी होता नहीं कभी पुरनम
जब तक उस की रज़ा नहीं होती..!!
~पुरनम इलाहाबादी