ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है
पर अपने ख़ून से गुलशन में रंग भरना है,
उससे मिलने को कई मोड़ से गुज़रना है
अभी तो आग के दरिया में भी उतरना है,
जिसके आने से बदल जाए ज़माने का निज़ाम
ऐसे इंसान को इस ख़ाक से उभरना है,
बह रहा दरिया इधर एक घूँट को तरसे
उदय प्रताप जी वादे से ये मुकरना है..!!
~अदम गोंडवी
ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं










Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari
Subscribe to get the latest posts sent to your email.




















1 thought on “ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है”