सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी

सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी
पयाम ए ज़ेर लबी को सला ए आम करें,

ग़ुलाम रह चुके तोड़ें ये बंद ए रुस्वाई
कुछ अपने बाज़ू ए मेहनत का एहतिराम करें,

ज़मीं को मिल के सँवारें मिसाल ए रू ए निगार
रुख़ ए निगार से रौशन चराग़ ए बाम करें,

फिर उठ के गर्म करें कारोबार ए ज़ुल्फ़ ओ जुनूँ
फिर अपने साथ उसे भी असीर ए दाम करें,

मेरी निगाह में है अर्ज़ ए मास्को मजरूह
वो सरज़मीं कि सितारे जिसे सलाम करें..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए रह का गुमाँ है

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