शमअ से ये कह रही है ख़ाक ए परवाना अभी
रात आख़िर हो गई बाक़ी है अफ़्साना अभी,
ख़त्म हो जाएगी इस के बा’द तफ़्सीर ए हयात
ज़िंदगी कहने को है एक और अफ़्साना अभी,
बाल तो आ ही गया अब टूटने की देर है
और एक सदमे का है मुहताज पैमाना अभी,
क़ैद पीने की नहीं पी कर बहकना जुर्म है
हम ने समझा ही नहीं दस्तूर ए मयख़ाना अभी,
आज तो शायद थके हारों की मंज़िल आ गई
और थोड़ी दूर चल ऐ अज़्म ए मर्दाना अभी,
उस के हाथों से कहीं दामन छुड़ाया जाएगा
तुम ने देखा ही नहीं है कोई दीवाना अभी,
देख ऐ रहरौ पहुँचना है हरीम ए नाज़ तक
का’बा रोकेगा तुझे रोकेगा बुतख़ाना अभी,
ज़ेहन में अब भी उभर आते हैं देरीना नुक़ूश
हँसते हँसते रो लिया करता है दीवाना अभी,
तू ग़म ए दुनिया से ऐ मख़मूर घबराता है क्यों
तेरी जानिब है निगाह ए पीर ए मयख़ाना अभी..!!
~मख़मूर देहलवी
रुख़ हर एक तीर ए नज़र का है मेरे दिल की तरफ़
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