फिर झूम उठा सावन फिर काली घटा छाई…

फिर झूम उठा सावन फिर काली घटा छाई
फिर दर्द ने करवट ली फिर याद तेरी आई,

होंठो पे हवाओ के फिर गीत उभर आये
सब तीर तेरे गम के इस दिल में उतर आये
फिर ज़ख्म सुलग उठे फिर जान पे बन आई,

फिर बाग़ वफ़ाओ के फूलो से महक उठे
फिर तेरी जुदाई के सब दाग दाहक उठे
फिर मेरे शबिस्ताँ में रोटी रही तन्हाई,

एक पल में यूँ ही जान से हम जाने लगे जानाँ
सब दर्द पुराने भी याद आने लगे जानाँ
बर्बाद उमंगो की फिर चढ़ के घटा आई..!!

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