ज़िक्र उस परीवश का और फिर…

ziqr us pariwash ka aur fir bayan uska

ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना बन गया रकीब आख़िर था जो राज़दां अपना, मय वो

यहाँ किसी को आवाज़ कहाँ उठाने…

यहाँ किसी को आवाज़

यहाँ किसी को आवाज़ कहाँ उठाने देता है कोई ज़रा सी आवाज़ करो तो गला दबा देता है

कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में…

kahan le jaaoon dil

कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की

ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है

ये जो हासिल हमें

ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है ये भी तो अपनी जगह एक परेशानी है, ज़िंदगी

बुझ गई आँख तेरा इंतज़ार करते करते

bujh-gayi-aankh-tera-intazar

बुझ गई आँख तेरा इंतज़ार करते करते टूट गए हम एक तरफ़ा प्यार करते करते, क़यामत है इज़हार

ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते

ये और बात है

ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते,

तेरा ये लुत्फ़ किसी ज़ख़्म का उन्वान न हो

तेरा ये लुत्फ़ किसी

तेरा ये लुत्फ़ किसी ज़ख़्म का उन्वान न हो ये जो साहिल सा नज़र आता है तूफ़ान न

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र…

है अजीब शहर की

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बदमिज़ाज सी

वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी…

वहशतें बिखरी पड़ी है

वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी जाऊँ मैं घूम फिर आया हूँ अपना शहर तेरा गाँव मैं,

क्या शर्त ए मुहब्बत है, क्या शर्त…

क्या शर्त ए मुहब्बत

क्या शर्त ए मुहब्बत है, क्या शर्त ए ज़माना है ! आवाज़ भी ज़ख़्मी है मगर गीत भी