हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर
हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर पर रोटी की कतार में आज भी
Patriotic Poetry
हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर पर रोटी की कतार में आज भी
ताक़तें तुम्हारी हैं और ख़ुदा हमारा है अक्स पर न इतराओ आईना हमारा है, आप की ग़ुलामी का
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए क़ातिल में है, ऐ
वतन की सरज़मीं से इश्क़ ओ उल्फ़त हम भी रखते हैं खटकती जो रहे दिल में वो हसरत
मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया, इक इश्क़
सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं दिल रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है ? कोठियों
भूख के एहसास को शेर ओ सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़्लिसों की अंजुमन तक ले
जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में ?
ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी फिर कहाँ से बीच में मस्जिद व मंदिर आ गए ?