क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तैयार हुए
क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तैयार हुए एक हमीं दीवाने निकले हम ही यहाँ पर
Occassional Poetry
क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तैयार हुए एक हमीं दीवाने निकले हम ही यहाँ पर
जाने क्या देखा था मैं ने ख़्वाब में फँस गया फिर जिस्म के गिर्दाब में, तेरा क्या तू
हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा एक पैकर में कहाँ क़ैद है पैकर मेरा, मैं
आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी एक एक पल की हम को ख़बर इस
ये कामयाबियाँ इज़्ज़त ये नाम तुम से है ऐ मेरी माँ मेरा सारा मक़ाम तुम से है, तुम्हारे
अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है रूह गंगा की हिमाला का बदन आज़ाद है, खेतियाँ
ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएँगे ग़म ज़ियादा हैं लिफ़ाफ़े में नहीं आएँगे, हम न मजनूँ
तुम्हारा हिज्र मनाया तो मैं अकेला था जुनूँ ने हश्र उठाया तो मैं अकेला था, ये मेरी अपनी
कह गया हूँ जो मैं रवानी में वो तो शामिल न था कहानी में, कोई लग़्ज़िश गुनाह तौबा
अदाएँ तुम बना लेना इशारे मैं बनाऊँगा तुम्हारे फूल जज़्बों को शरारे मैं बनाऊँगा, तुम्हारा साथ शामिल है