कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो
कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो किसी भी अप्सरा से गुफ़्तुगू न हो, क़ज़ा हुआ है
Occassional Poetry
कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो किसी भी अप्सरा से गुफ़्तुगू न हो, क़ज़ा हुआ है
दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं जीवन ख़ुश बख़्त हुआ ही नहीं, इसे तोड़ना भी तो नर्मी
सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में उलझनें कितनी हैं इस इश्क़ की आसानी में, ये तेरे बालों का
ये तेरे हुस्न का आवेज़ा जो महताब नहीं का’बा ए इश्क़ नहीं रौज़ा ए यक ख़्वाब नहीं, एक
सर को आवाज़ से वहशत ही सही और वहशत में अज़िय्यत ही सही, ख़ाक ज़ादी तेरे उश्शाक़ बहुत
लहू रगों में सँभाला नहीं गया मुझ से किसी दिशा में उछाला नहीं गया मुझ से, सुडौल बाँहों
लहू में रंग ए सुख़न उस का भर के देखते हैं चराग़ बाम से जिस को उतर के
ख्याल था कि तुझे पा के ख़ुद को ढूँढेंगे तू मिल गया है तो ख़ुद अपनी ज़ात से
आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था इस क़तरे को बनना
जो समझाते भी आ कर वाइज़ ए बरहम तो क्या करते हम इस दुनिया के आगे उस जहाँ