एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ
एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ जिस की ज़द में है पहाड़ों का धुआँ आया हुआ,
Occassional Poetry
एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ जिस की ज़द में है पहाड़ों का धुआँ आया हुआ,
अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है हमारी आँख में एक शख़्स बे तहाशा है, ज़रा सी
अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना मुझ को भी किसी और का रस्ता नहीं बनना,
आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो, ये
किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे गुज़र गई जरस ए गुल उदास कर के
तेरी ज़ुल्फ़ों के बिखरने का सबब है कोई आँख कहती है तेरे दिल में तलब है कोई, आँच
वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे हज़ार बार मिलो फिर भी आश्ना न
जब रात गए तेरी याद आई सौ तरह से जी को बहलाया कभी अपने ही दिल से बातें
तेरे ख़याल से लो दे उठी है तन्हाई शब ए फ़िराक़ है या तेरी जल्वा आराई, तू किस
कौन उस राह से गुज़रता है दिल यूँही इंतिज़ार करता है, देख कर भी न देखने वाले दिल