कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया

kuch dino to shahar sara

कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया फिर हुआ यूँ वो किसी की मैं किसी का

उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ

uth ke kapde badal ghar se

उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ रात के बाद दिन आज के

उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा

us ke dushman hai

उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा, इतना

घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे

ghar se nikalte to

घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे, इतना आसाँ

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो

har ek ghar me diya bhi jale

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है

nayi nayi aankhen ho to har manzar

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी…

aaj zara fursat paai thi

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया बंद गली के आख़िरी घर को खोल के

मुँह की बात सुने हर कोई…

munh ki baat sune har koi

मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी

har taraf har jagah beshum

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी, सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता

आज ज़रा फुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया

aaj zara fursat paai thi

आज ज़रा फुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया बंद गली के आख़िरी घर को आज फिर