दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं
दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं आईना माँगे जो हम से वो परी रू
General Poetry
दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं आईना माँगे जो हम से वो परी रू
हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे थक गए तो ख़्वाब की दहलीज़ पर सोते
अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो इतना गहरा मेरी आवाज़ से पर्दा न करो,
ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दिया हूँ और हवा
बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक
कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली न पूछ कैसे बसर हम ने ज़िंदगी कर ली,
मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना जहाँ दरिया मिले बे आब मेरा नाम लिख देना, ये
होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी बरहम हुई है यूँ भी तबी’अत कभी कभी, ऐ दिल
तेरे आने का धोका सा रहा है दिया सा रात भर जलता रहा है, अजब है रात से
वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए ? वो सुब्ह आते आते