अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो
अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो एक और ज़ख्म खा लूँ अगर इजाज़त हो, तुम्हारे आरिज़
General Poetry
अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो एक और ज़ख्म खा लूँ अगर इजाज़त हो, तुम्हारे आरिज़
पानी के उतरने में अभी वक़्त लगेगा हालात सँवरने में अभी वक़्त लगेगा, मच्छर से, कोरोना से अभी
फ़सुर्दगी का मुदावा करें तो कैसे करें वो लोग जो तेरे क़ुर्ब ए जमाल से भी डरें, एक
एक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है एक होश रुबा इनआ’म कि साक़ी रात गुज़रने
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न
जो हम पे गुज़रे थे रंज़ सारे, जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे जब अपनी अपनी मुहब्बतों
नसीम ए सुबह गुलशन में गुलो से खेलती होगी किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी, तुम्हे
किस एहतियात से उसने नज़र बचाई है ज़माना अब भी समझता है आशनाई है, मेरे अज़ीज़ है इसका
उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर परवरिश पाई है अपने ख़ून ही की धार पर,
जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी मैं तो आवाज़ हूँ आवाज़ की हिजरत कैसी ? सुनने वालों