ये क़ुदरत भी अब तबाही की हुई शौक़ीन

ye-qudrat-bhi-ab

ये क़ुदरत भी अब तबाही की हुई शौक़ीन लगती है ऐ दौर ए ज़दीद साज़िश तेरी बहुत संगीन

बात अब करते है क़तरे भी समंदर…

baat ab karte hai

बात अब करते है क़तरे भी समंदर की तरह लोग ईमान बदलते है कलेंडर की तरह, कोई मंज़िल

हम प्यास के मारों का इस तरह गुज़ारा है

ham pyas ke maaro ka

हम प्यास के मारों का इस तरह गुज़ारा है आँखों में नदी लेकिन हाथो में किनारा है, दो

क्यूँ खौफ़ इस क़दर है तुम्हे हादसात का ?

क्यूँ खौफ़ इस क़दर

क्यूँ खौफ़ इस क़दर है तुम्हे हादसात का ? एक दिन ख़ुदा दिखाएगा रास्ता निज़ात का, ये तजरुबा

वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा….

wo ek lafz jo besada

वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा वही मुद्दतों तक सुना जाएगा, कोई है जो मेरे तआक़ुब में है

मुक़द्दर ने कहाँ कोई नया पैग़ाम लिखा है

muqaddar ne kahan koi

मुक़द्दर ने कहाँ कोई नया पैग़ाम लिखा है अज़ल ही से वरक़ पर दिल के तेरा नाम लिखा

मुझे तन्हाई के ग़म से बचा लेते तो…

मुझे तन्हाई के ग़म

मुझे तन्हाई के ग़म से बचा लेते तो अच्छा था सफ़र में हमसफ़र अपना बना लेते तो अच्छा

सुबह तक मैं सोचता हूँ शाम से…

subah tak sochta hoon

सुबह तक मैं सोचता हूँ शाम से जी रहा है कौन मेरे नाम से, शहर में सच बोलता

नदी के पार उजाला दिखाई देता है

नदी के पार उजाला

नदी के पार उजाला दिखाई देता है मुझे ये ख़्वाब हमेशा दिखाई देता है, बरस रही हैं अक़ीदत

ज़बाँ है मगर बे ज़बानों में है….

ज़बाँ है मगर बे

ज़बाँ है मगर बे ज़बानों में है नसीहत कोई उसके कानों में है, चलो साहिलों की तरफ़ रुख़