फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा
फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा मुझे आज कल इतनी फ़ुर्सत नहीं है, सलामत रहे तेरी आँखों की मस्ती
Life Poetry
फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा मुझे आज कल इतनी फ़ुर्सत नहीं है, सलामत रहे तेरी आँखों की मस्ती
कहना ग़लत ग़लत तो छुपाना सही सही क़ासिद कहा जो उस ने बताना सही सही, ये सुब्ह सुब्ह
अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का बस एक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का,
बात साक़ी की न टाली जाएगी कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी, वो सँवरते हैं मुझे इस की
ज़माना है कि गुज़रा जा रहा है ये दरिया है कि बहता जा रहा है, वो उट्ठे दर्द
दिल गया दिल लगी नहीं जाती रोते रोते हँसी नहीं जाती, आँखें साक़ी की जब से देखी हैं
निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं, गुनह गुनह न रहा
देखा जो हुस्न ए यार तबीअत मचल गई आँखों का था क़ुसूर छुरी दिल पे चल गई, हम
बहुत रहा है कभी लुत्फ़ ए यार हम पर भी गुज़र चुकी है ये फ़स्ल ए बहार हम
एक बोसा दीजिए मेरा ईमान लीजिए गो बुत हैं आप बहर ए ख़ुदा मान लीजिए, दिल ले के