हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह

hum hain mataa e kucha o baazar kee tarah

हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह, इस कू

कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा

koi humdam na raha koi sahara na raha

कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा, शाम

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे

humare baad ab mahfil me afsaane bayaan honge

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे, इसी

मिट्टी की सुराही है

mitti kee suraahi hai

मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है, उश्शाक़ नहीं हम लोग पर रंग तो काही है, हर

रस्ते में अजब आसार मिले

raste me azab aasaar mile

रस्ते में अजब आसार मिले जूँ कोई पुराना यार मिले, जिस तरह कड़कती धूपों में दो जिस्मों को

एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ

ek vazeefa hai kisi dard ka dohraya hua

एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ जिस की ज़द में है पहाड़ों का धुआँ आया हुआ,

अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है

adaa hai khwab hai taskeen hai tamaasha hai

अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है हमारी आँख में एक शख़्स बे तहाशा है, ज़रा सी

अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना

ab tum ko hi savan ka sandesa nahi banana

अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना मुझ को भी किसी और का रस्ता नहीं बनना,

आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो

aaraaesh e khyal bhi ho dilkusha bhi ho

आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो, ये

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे

kisi kali ne bhi dekha na aankh bhar ke mujhe

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे गुज़र गई जरस ए गुल उदास कर के