हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह
हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह, इस कू
Gazals
हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह, इस कू
कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा, शाम
हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे, इसी
मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है, उश्शाक़ नहीं हम लोग पर रंग तो काही है, हर
रस्ते में अजब आसार मिले जूँ कोई पुराना यार मिले, जिस तरह कड़कती धूपों में दो जिस्मों को
एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ जिस की ज़द में है पहाड़ों का धुआँ आया हुआ,
अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है हमारी आँख में एक शख़्स बे तहाशा है, ज़रा सी
अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना मुझ को भी किसी और का रस्ता नहीं बनना,
आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो, ये
किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे गुज़र गई जरस ए गुल उदास कर के