कुछ रोज़ से रोज़ शाम बस यूँ ही ढल जाती है
बीती हुई यादो की शमाँ मेरे सिरहाने जल जाती है,
चेहरा तो छुपा लेता है मेरी हर के तकलीफ़ को
दर्द और ख़ामोशी मगर आँखों में पिघल जाती है,
मैं बीते कल को तलाश करता हूँ मौजूदा आज में
और इन्ही कोशिशो में रोज़ तारीख़ बदल जाती है,
एक आरज़ू है मेरे दिल में कि ऐसा मुक़ाम आए
ज़िन्दगी में अपनी भी कोई एक ऐसी शाम आए,
जब अपना हर कोई अपने क़रीब नज़र आए
हमने देखे है जो भी ख़्वाब वो हकीक़त बन जाए,
बस यही ख्यालात लिए रात तन्हा चली आती है
कुछ रोज़ से रोज़ शाम बस यूँ ही ढल जाती है..!!
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