छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ
अपना तो सब के हाथों ख़सारा बहुत हुआ,
क्या बेसबब किसी से कहीं ऊबते हैं लोग
बावर करो कि ज़िक्र तुम्हारा बहुत हुआ,
बैठे रहे कि तेज़ बहुत थी हवा ए शौक़
दश्त ए हवस का गरचे इरादा बहुत हुआ,
आख़िर को उठ गए थे जो एक बात कह के हम
सुनते हैं फिर उसी का इआदा बहुत हुआ,
मिलने दिया न उससे हमें जिस ख़याल ने
सोचा तो इस ख़याल से सदमा बहुत हुआ,
अच्छा तो अब सफ़र हो किसी और सम्त में
ये रोज़ ओ शब का जागना सोना बहुत हुआ..!!
~अहमद महफूज़
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