कोई और है नहीं तो नहीं मे रू ब रू कोई और है
बड़ी देर मैं तुझे देख कर ये लगा कि तू कोई और है,
ये गुनाहगारों की सर ज़मीं है बहिश्त से भी सिवा हसीं
मगर इस दयार की ख़ाक में सबब ए नुमू कोई और है,
जिसे ढूँढता हूँ गली गली वो है मेरे जैसा ही आदमी
मगर आदमी के लिबास में वो फ़रिश्ता ख़ू कोई और है,
कोई और शय है वो बे ख़बर जो शराब से भी है तेज़ तर
मेरा मयकदा कहीं और है मेरा हम सुबू कोई और है..!!
~नासिर काज़मी
ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा
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