सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है
ये तकल्लुफ़ है कि जज़्बात की पामाली है,
आसमानों से उतरने का इरादा हो तो सुन
शाख़ पर एक परिंदे की जगह ख़ाली है,
जिस की आँखों में शरारत थी वो महबूबा थी
ये जो मजबूर सी औरत है ये घर वाली है,
रात बे-लुत्फ़ है परहेज़ के सालन की तरह
दिन भिकारी के कटोरे की तरह ख़ाली है,
मुद्दतों ख़ुद को भरोसे में लिया है मैं ने
तब कहीं तेरी मोहब्बत ने सिपर डाली है..!!
~शकील जमाली
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