गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र ओ सहाब

गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र ओ सहाब
हटा दिए हैं ज़मान ओ मकाँ के हम ने हिजाब,

लहद की मिट्टी की तक़दीर की अमान मैं दूँ
सफ़ेद लट्ठे में कफ़ना के सुर्ख़ शाख़ ए गुलाब,

मैं आसमान तेरे जिस्म पे बिछा देता
मगर ये नील में चादर बनी नहीं कमख़ाब,

तेरा वो रातों को उठ कर सिसक सिसक रोना
लहू में नींद की टीसें पलक पे इज्ज़ के ख़्वाब,

तेरे जलाए दियों में भड़कती आग का फेर
ज़मीं की रेहल पे रक्खे न रौशनी की किताब,

हवा बहिश्त के बाग़ों की ज़ुल्फ़ ज़ुल्फ़ फिरे
तेरी लहद तेरे बालीं के गर्द जू ए शराब,

कमान खींच ज़माने की सू ए सीना ज़नाँ
ऐ फ़र्क़ ए नाज़ गले से उतार तौक़ ए ग़याब,

मैं एक यख़-ज़दा माथे को चूम कर दम ए सुब्ह
तेरी ज़मीनों से गुज़रूँगा ऐ जहान ए ख़राब,

मशक़्क़ती हैं तेरे काख़ ओ कू ए हिज्र के हम
ऐ कारख़ाना ए अफ़्लाक ओ ख़ाक ओ आब ओ सराब,

ये तंग ओ तार गढ़ा नूर से भरे आमिर
सदा रहे तेरे हुजरे में हाला ए माहताब..!!

~आमिर सुहैल

दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही

Leave a Reply