मुझे यक़ीं है कोई रास्ता तो निकलेगा
अगर जो कुछ नहीं निकला ख़ुदा तो निकलेगा,
मैं रेगज़ारों में दरिया तलाश करता हूँ
मेरी तलाश से एक सिलसिला तो निकलेगा,
किताब ए ज़ीस्त के पन्ने पलट रहा हूँ मैं
किसी वरक़ से कोई फ़ल्सफ़ा तो निकलेगा,
दिए दिखाते रहो दिन में ऐसे सूरज को
जो उस के दिल में अंधेरा हुआ तो निकलेगा,
ये सोच कर के चमन में लगा दी आग उस ने
के इस में कोई परिंदा हुआ तो निकलेगा,
सदाएँ देना मेरा काम है करूँगा मैं
कोई पहाड़ मेरा हमनवा तो निकलेगा,
मैं सारे शहर को ख़्वाबीदा छोड़ कर निकला
के आँख खुलने पे एक रहनुमा तो निकलेगा,
चलो भी शम्स उठो जुगनुओं की महफ़िल से
तुम्हारे बा’द कोई मुद्द’आ तो निकलेगा..!!
~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स
रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई
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