मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर

मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर
मुझ से बिछड़ा हुआ कोई अपना मिला रात के इस पहर,

नींद क्यों उड़ गई चैन क्यों खो गया रात के इस पहर
ये अचानक मेरे साथ क्या हो गया रात के इस पहर ?

यूँ लगा मुझ को जैसे फ़ज़ा ख़ुश्बूओं से महकने लगी
फिर किसी की गली से चली है हवा रात के इस पहर,

दिल में जागी है कैसी तमन्ना नई ख़ुद मैं हैरान हूँ
एक नई आरज़ू ने मुझे छू लिया रात के इस पहर,

एक मंज़िल बसी थी निगाहों में जाने वो क्या हो गई
और ख़ुद बख़ुद एक गुलशन बसा रात के इस पहर,

उस की बिखरी हुई लट ने उलझाए रखा मुझे और मैं
चाहता था हटा दूँ न मुमकिन हुआ रात के इस पहर,

और क्या कीजिएगा सबीह उस की अब आप मंज़र कशी
पल जो आया और आ कर चला भी गया रात के इस पहर..!!

~सबीहुद्दीन शोऐबी

मैं जो कहता हूँ तू कजरवी छोड़ दे

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