मौज ए गुल मौज ए सबा मौज ए सहर लगती है

मौज ए गुल मौज ए सबा मौज ए सहर लगती है
सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है,

हमने हर गाम पे सज्दों के जलाए हैं चराग़
अब हमें तेरी गली राहगुज़र लगती है,

लम्हे लम्हे में बसी है तेरी यादों की महक
आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है,

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है ?

सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है
हर ज़मीं मुझ को मेरे ख़ून से तर लगती है,

कोई आसूदा नहीं अहल ए सियासत के सिवा
ये सदी दुश्मन ए अरबाब ए हुनर लगती है,

वाक़िआ शहर में कल तो कोई ऐसा न हुआ
ये तो अख़बार के दफ़्तर की ख़बर लगती है,

लखनऊ क्या तेरी गलियों का मुक़द्दर था यही
हर गली आज तेरी ख़ाक बसर लगती है..!!

~जाँ निसार अख़्तर


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