ज़ुल्म के तल्ख़ अंधेरो के तलबगार हो तुम

zulm ke talkh andhero ke talabgaar ho tum

ज़ुल्म के तल्ख़ अंधेरो के तलबगार हो तुम ये इल्म है कि नफ़रत के मददगार हो तुम, जिसके

समंदरों में हमारा निशान फैला है

samandaro me hamara nishan faila hai

समंदरों में हमारा निशान फैला है पलट के देख मुए आसमान फैला है, मुक़ाबला है ख़ुराफ़ात का अँधेरों