फ़िराक़ ओ हिज्र के लम्हे जो टल गए होते
फ़िराक़ ओ हिज्र के लम्हे जो टल गए होते हमारे ज़ेहन के ख़ाके बदल गए होते, वो मस्लहत
Sad Poetry
फ़िराक़ ओ हिज्र के लम्हे जो टल गए होते हमारे ज़ेहन के ख़ाके बदल गए होते, वो मस्लहत
दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत घर को वीराँ करूँ तो घास बहुत, रोब पड़ जाए इस
अब रहा क्या जो लुटाना रह गया ज़िंदगी का एक ताना रह गया, एक तअल्लुक़ जिन से था
एक लम्हा कि मिलें सारे ज़माने जिसमें एक नुक्ता सभी हिकमत के ख़ज़ाने जिसमें, दायरा जिसमें समा जाएँ
सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए पलकों को आज बीते हुए पल भिगो गए, आँसू फ़लक
जिसकी ख़ातिर मैने दुनिया की तरफ़ देखा न था वो मुझे यूँ छोड़ जाएगा कभी सोचा न था,
गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था वो एक ख़्वाब था या बस नज़र का धोखा था
छा गया मेरे मुक़द्दर पे अंधेरा ऐ दोस्त तू ने शानों पे जो गेसू को बिखेरा ऐ दोस्त,
सदाक़तों को ये ज़िद है ज़बाँ तलाश करूँ जो शय कहीं न मिले मैं कहाँ तलाश करूँ ?
कैसे सुनाऊँ ग़म की कहानी साँसों पर है बार बहुत माज़ी कहता है कह जाओ हाल को है