सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा
सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा अब इंतिज़ार के मारों का हाल क्या होगा ? तेरी
Occassional Poetry
सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा अब इंतिज़ार के मारों का हाल क्या होगा ? तेरी
फ़स्ल ए गुल है सजा है मयख़ाना चल मेरे दिल खुला है मयख़ाना, शाम के वक़्त बैठने के
फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा मुझे आज कल इतनी फ़ुर्सत नहीं है, सलामत रहे तेरी आँखों की मस्ती
कहना ग़लत ग़लत तो छुपाना सही सही क़ासिद कहा जो उस ने बताना सही सही, ये सुब्ह सुब्ह
अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का बस एक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का,
बात साक़ी की न टाली जाएगी कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी, वो सँवरते हैं मुझे इस की
ज़माना है कि गुज़रा जा रहा है ये दरिया है कि बहता जा रहा है, वो उट्ठे दर्द
दिल गया दिल लगी नहीं जाती रोते रोते हँसी नहीं जाती, आँखें साक़ी की जब से देखी हैं
निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं, गुनह गुनह न रहा
देखा जो हुस्न ए यार तबीअत मचल गई आँखों का था क़ुसूर छुरी दिल पे चल गई, हम