मेरे पीछे ये तो मुहाल है कि ज़माना गर्म ए सफ़र न हो
मेरे पीछे ये तो मुहाल है कि ज़माना गर्म ए सफ़र न हो कि नहीं मेरा कोई नक़्श
Occassional Poetry
मेरे पीछे ये तो मुहाल है कि ज़माना गर्म ए सफ़र न हो कि नहीं मेरा कोई नक़्श
दस्त ए पुर ख़ूँ को कफ़ ए दस्त ए निगाराँ समझे क़त्ल गह थी जिसे हम महफ़िल ए
मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है मज़हब तो बस मज़हब ए
ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए हँसा है चाक ए पैराहन न क्यूँ
जल्वा ए गुल का सबब दीदा ए तर है कि नहीं मेरी आहों से बहाराँ की सहर है
अदा ए तूल ए सुख़न क्या वो इख़्तियार करे जो अर्ज़ ए हाल ब तर्ज़ ए निगाह ए
वो तो गया ये दीदा ए ख़ूँ बार देखिए दामन पे रंग ए पैरहन ए यार देखिए, दिखला
डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को, जमाल
सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी तेरे आँचल की मेहमानी, सहज सहज उस हुस्न का चलना उस पे अंधी शब
कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने हरम सरा से बुलाया हमें वतन अपने, खुले गले की क़मीसें