उधर की शय इधर कर दी गई है

उधर की शय इधर

उधर की शय इधर कर दी गई है ज़मीं ज़ेर ओ ज़बर कर दी गई है, ये काली

न घर है कोई न सामान कुछ रहा बाक़ी

न घर है कोई

न घर है कोई, न सामान कुछ रहा बाक़ी नहीं है कोई भी दुनिया में सिलसिला बाक़ी, ये

किस तवक़्क़ो’ पे क्या उठा रखिए ?

kis tavaqqo pe kya

किस तवक़्क़ो’ पे क्या उठा रखिए ? दिल सलामत नहीं तो क्या रखिए ? लिखिए कुछ और दास्तान

किस को मालूम है क्या होगा नज़र से पहले

किस को मालूम है

किस को मालूम है क्या होगा नज़र से पहले होगा कोई भी जहाँ ज़ात ए बशर से पहले

क़दम रखता है जब रास्तो पे यार आहिस्ता आहिस्ता

qadam rakhta hai jab

क़दम रखता है जब रास्तो पे यार आहिस्ता आहिस्ता तो छट जाता है सब गर्द ओ ग़ुबार आहिस्ता

सवालो के बदले लहज़े ऐसे…

sata le hamko jo dilchaspi hai unhe hamko satane me

सवालो के बदले लहज़े ऐसे कि हमें जानते ही न हो जैसे, मिजाज़ मौसम भी न बदले वो

खफ़ा मत हो अभी तो प्यार के दिन है

khafa mat ho abhi to

खफ़ा मत हो अभी तो प्यार के दिन है इब्तिदा ए मुहब्बत में अभी मल्हार के दिन है,

जितने हरामखोर थे क़ुर्ब ओ जवार में

जितने हरामखोर थे क़ुर्ब

जितने हरामखोर थे क़ुर्ब ओ जवार में परधान बनके आ गए अगली क़तार में, दीवार फाँदने में यूँ

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे

आँख पर पट्टी रहे

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे अपने शाह ए वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी

ये अमीरों से हमारी

ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी फिर कहाँ से बीच में मस्ज़िद ओ मंदिर आ गए ?