बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस…
बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस फ़ितरत है उसको कहाँ पता हया क्या ? क्या शराफ़त है, हमें
Occassional Poetry
बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस फ़ितरत है उसको कहाँ पता हया क्या ? क्या शराफ़त है, हमें
कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में अदा से प्रेम करो दिल से प्यार होली में, गले
अगर आज भी बोली ठोली न होगी तो होली ठिकाने की होली न होगी, बड़ी गालियाँ देगा फागुन
दिल में उठती है मसर्रत की लहर होली में मस्तियाँ झूमती हैं शाम ओ सहर होली में, सारे
ये नूर उतरेगा आख़िर ग़ुरूर उतरेगा जनाब उतरेगा बंदा हुज़ूर उतरेगा, जो चढ़ गया है वो ऊपर नहीं
तबीब हो के भी दिल की दवा नहीं करते हम अपने ज़ख़्मों से कोई दग़ा नहीं करते, परिंदे
दो चार गाम राह को हमवार देखना फिर हर क़दम पे एक नई दीवार देखना, आँखों की रौशनी
दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ छेड़ो न मुझे मैं कोई दीवाना नहीं हूँ, इस कसरत ए
अब तरसते हो कि बच्चे मेरे बोले उर्दू उन्हें अफरंग बनाने की ज़रूरत क्या थी ? आज रोते
औरों की प्यास और है और उसकी प्यास और कहता है हर गिलास पे बस एक गिलास और,