काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता
काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता फिर मुझे तुझ से क्या गिला होता ? इश्क़ होता है क्या
Occassional Poetry
काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता फिर मुझे तुझ से क्या गिला होता ? इश्क़ होता है क्या
इस जादा ए उश्शाक़ की तक़दीर अजब है मुट्ठी में जहाँ पाँव में ज़ंजीर अजब है, बे वक़अत
गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र ओ सहाब हटा दिए हैं ज़मान ओ मकाँ के हम
दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही कोई दिन और मैं रुस्वा सर ए बाज़ार सही, फिर
सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी पयाम ए ज़ेर लबी को सला ए आम करें, ग़ुलाम
वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए रह का गुमाँ है वो शो’ला ए आवारा हमारी ही
आबला पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में सुर्ख़ काँटों की बहार आई है अब के बन
जुनून ए दिल न सिर्फ़ इतना कि एक गुल पैरहन तक है क़द ओ गेसू से अपना सिलसिला
हों जो सारे दस्त ओ पा हैं ख़ूँ मैं नहलाए हुए हम भी हैं ऐ दिल बहाराँ की
जिस दम ये सुना है सुब्ह ए वतन महबूस फ़ज़ा ए ज़िंदाँ में जैसे कि सबा ऐ हम